Thursday, October 29, 2009

youthपाठशाला का दूसरा अंक " ह्यासिये पर छात्र संघ राजनीति "

youthपाठशाला का दूसरा अंक " ह्यासिये पर छात्र संघ राजनीति "

दोस्तों ...........आपकी अपनी मैगजीन youthपाठशाला का दूसरा अक्तूबर अंक आ चुका है ! इस अंक में छात्र राजनीति से लेकर दोस्ती के तमाम अनछुए पहलुओं का जिक्र आपको बड़ी सहजता से देखने को मिल सकता है ! कुल मिला कर अगर कहें तो youthपाठशाला अपने शुरुआती दौर में में ही बहुत अच्छा कर रही है और अगर आपका सहयोग मिला तो निरंतर अच्छा करती जायेगी !
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Sunday, October 18, 2009

दोस्ती करने के लायक नहीं शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

दोस्तों .......................आज मै जो कुछ भी लिखने जा रहा हूँ शायद मेरी हठधर्मिता के अलावा कुछ भी नहीं है ! मै नहीं जानता की आप लोग मुझे किस तरह जानते हो या नहीं जानते हो ........? आज मै अपना सर उठा कर गर्व से कह रहा हूँ कि मै आज तक एक अच्छा दोस्त नहीं बन पाया ! अगर औरों के लफ्जों में कहें तो " शिवा के साथ दोस्ती महफूज़ नहीं है " मुझे इन लफ्जों पर भी गर्व है ! सही कहें तो मुझे दोस्ती पसंद ही नहीं है और नाही कोई दिलचस्पी है क्योंकि टूटने के बाद यह नश्तर बन कर दिल में उतर जाती है ! असल में दोस्ती को ना तो मै संभाल सकता हूँ और ना ही इसे बरकरार रख पाता हूँ ! दोस्ती कि दौड़ में हमेशा बहुत आगे निकल जाता हूँ और तब मुझे एहसास होता है या दिलाया जाता है कि मै अपनी सीमा से बाहर आ गया हूँ , और फिर शुरू होता है तकलीफों का दौर , जो मै आज तक ढ़ो रहा हूँ ! क्या करूँ मै कभी दोस्ती की सीमा और परिधि को मापने का प्रयास ही नहीं करता ! एक मुकाम पर पहुचने के बाद मै इतना अंधउत्साही हो जाता हूँ की मुझे दुनिया की हर अच्छी- बुरी चीज़ें अपने दोस्ती के आगे बौनी नज़र आती हैं ! मुझे यह झूठा भ्रम हो जाता है की कोई भी बात मेरी दोस्ती को तोड़ नहीं पायेगी ! मै अंध उत्साह में बहुत अच्छी चीज़ें भी करता हूँ और बुरा बुरा काम भी करता हूँ , सिर्फ इस उम्मीद के साथ की इन सब चीज़ों का हमारे आतंरिक या जज्बाती संबंधों पर कोई फर्क नहीं पडेगा , और मेरी दोस्ती बरकरार रहेगी ! एक दिन मेरा भ्रम तार-तार हो जाता है ! आखिरी में मै एक बात कहना चाहूँगा कि मेरे विचार में दोस्ती(रिश्ते) एक ऐसे वृत में होनी चाहिए जिसमे हजारों अच्छी बुरी चीज़ें समा जाये युगों-युगों के लिए , जो किसी भी परिस्थिति में उस निर्धारित वृत से बाहर न जाएँ , चाहें बुरा दौर हो या दोस्ती का अच्छा दौर क्यों ना चल रहा हो !
मै अलग अलग मानक बनाकर दोस्ती नहीं कर सकता ! खैर जो भी हो मुझे तमाम लोग मिले लेकिन दोस्ती के अच्छे दौर में तो सब कुछ ठीक चला लेकिन जब दोस्ती का एक अलग दौर शुरू हुआ तो वो वृत खंडित हो गया और मेरी दोस्ती समाज के सामने तमाशा बन गयी और और उस तमाशे में सिर्फ मै और मेरा दोस्त नहीं वरन और कुछ पात्र भी आ गए जिन्हें मै जानता भी नहीं था !बुरे दौर में भी मुझे लगा कि मेरा वृत महफूज़ है परन्तु जब कुछ और लोग उस वृत में घुसे तब मुझे लगा मेरा वृत खंडित हो चुका है ! इतना होने के बाद मेरे लिए दोस्ती कोई मायने नहीं रखती है ! आज तक मुझे कोई ऐसा नहीं मिला जो उस वृत को बचा सके , संभाल सके ,अत: मुझे यह कहना पड़ रहा है कि " मेरे साथ दोस्ती महफूज़ नहीं है "....क्या करूँ मै ऐसा ही हूँ !