प्रियंका ने लिखा ...................
हकीक़त में यूथ पाठशाला को स्वप्नम् ने ही जन्म दिया था , मगर कुछ कारणों से उसे पाल नहीं सके !जी हाँ , ये मैगजीन नहीं बल्कि हमारे लिए बच्चे से बढ़कर है ,लेकिन अब जब हर कोई इसे भूल चुका है , यूथ पाठशाला को दोस्ती तोड़ने जैसी बातों के लिए याद किया गया !तब दो साल आठ महीने के लम्बे इंतज़ार के बाद यूथ पाठशाला को पालने के लिए पंचतत्व आगे आया है !आज स्वप्नम् सामने न सही , पर कही न कही वो आज भी साथ है ! क्योंकि जब तक दोस्ती लफ्ज़ है , स्वप्नम् ख़त्म नहीं हो सकता !
प्रियंका भारद्वाज " एडिटर youthपाठशाला"
मेरी कलम से ................
प्रियंका ने यह सब कुछ यूथ पाठशाला के अगस्त अंक में लिखा ........................इन पंक्तियों पर व्याख्यात्मक टिप्पणी करने की मेरी हार्दिक इच्क्षा थी परन्तु नहीं कर सकता हूँ , "विचार बहुत हैं परन्तु व्यक्त करने का दायरा सीमित" ! लेखनी में सीमा ज्ञान परिहार्य है और मेरे विचार में प्रियंका भी इन पंक्तियों को लिखते समय उस सीमा वृत्त में जरुर बंधी होंगी ! इन पंक्तियों को वह व्यक्ति ज्यादा अर्थ दे सकता है जो स्वप्नम् के रूह रूह को जानता है , जो स्वप्नम् को नहीं जानता या कम जानता है उसके लिए यह भ्रमात्मक है ! मुझसे अगर कोई स्वप्नम् को पूछे तो मै सिर्फ यही कहूंगा कि मै सिर्फ स्वप्नम् को एक शब्द-विशेष की तरह जानता हूँ............'स्वप्नम्'....सिर्फ स्वप्नम् .......इससे ज्यादा कुछ नहीं ! प्रियंका से मैंने पूछा की स्वप्नम् क्या है ?.................उसने कहा ........."दोस्तों का समूह "......मन में आया कह दूँ कि फिर तो दोस्ती की परिभाषा ही बदल देनी होगी .................दोस्ती कि वर्त्तमान परिभाषा बौनी दिख रही थी स्वप्नम् के आगे ......मगर मै नहीं कहा उस वक़्त ! मै बिना नाम लिए बताना चाहूँगा उसमे एक लेख मैंने पढा .......दिल को छू गया ..........स्वप्नम् को एक प्रश्न कि तरह मेरे दिलोदिमाग में बैठा दिया ! उस प्रश्न का कोई जवाब मै किसी से मांगना मुनासिब नहीं समझा , पता नहीं कब कौन बुरा मान जाय ?....................क्योंकि स्वप्नम् पर कुछ ख़ास लोगों का अधिकार है और मेरे अनुसार अगर मै कुछ पूछता तो अतिव्यापन होता , और मै यह नहीं चाहता था ! खैर जो भी हो स्वप्नम् अपने खट्टे मीठे यांदों के साथ महफूज़ रहे यही मेरी ख्वाहिश एवं खुदा से इल्तजा है !
अगर मेरे इस टिप्पणी से किसी को कोई आघात पहुचा हो तो अर्जे मुआफी करता हूँ !
आपका
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"
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